बस्ती का ‘लाइफ लाइन’ हॉस्पिटल या विवादों का ‘अखाड़ा’? सवालों के घेरे में संचालक की साख!
दलालों के चंगुल में 'लाइफ लाइन' हॉस्पिटल: क्या सीएमओ और मीडिया मैनेजमेंट से ही बची रहेगी साख?
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती का ‘लाइफ लाइन’ हॉस्पिटल: जीवन बचाने का केंद्र या विवादों का ‘अखाड़ा’?
- आखिर डॉ. तारिक के ‘लाइफ लाइन’ हॉस्पिटल का हर कोई दुश्मन क्यों? इलाज या वसूली का धंधा?
- बस्ती का ‘लाइफ लाइन’ हॉस्पिटल: इलाज में लापरवाही या मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़?
- बस्ती का ‘लाइफ लाइन’ हॉस्पिटल: जीवन रक्षक या जेब काटकर दम तोड़ने का अड्डा?
बस्ती: जनपद के जिला अस्पताल चौराहे पर स्थित ‘लाइफ लाइन हॉस्पिटल’ इन दिनों चिकित्सा सेवा के बजाय अपने कारनामों को लेकर सुर्खियां बटोर रहा है। यह अस्पताल किसी मरीज के लिए ‘लाइफ लाइन’ साबित हो रहा है या विवादों का पिटारा, यह यक्ष प्रश्न आज हर बस्तीवासी की जुबां पर है।
आरोपों की फेहरिस्त लंबी, जबाब गोलमोल
हॉस्पिटल और उसके संचालक डॉ. तारिक पर लगे आरोपों की सूची छोटी नहीं है। कभी मनमाना बिल वसूलने का आरोप, तो कभी इलाज में गंभीर लापरवाही—अस्पताल पर आए दिन सवाल उठते रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब मामला गंभीर होता है, तो अस्पताल प्रशासन द्वारा मरीजों, विशेषकर मासूम बच्चों को डिस्चार्ज करने में आनाकानी क्यों की जाती है? क्या यह मजबूरी का फायदा उठाना नहीं है?
’ब्लैकमेलिंग’ का दांव या सच्चाई से बचाव?
जब भी इन विवादों पर डॉ. तारिक का पक्ष जानने की कोशिश की जाती है, तो उनका एक ही रटा-रटाया जवाब होता है—”हमें ब्लैकमेल किया जा रहा है और फर्जी आरोप लगाए जा रहे हैं।” बड़ा सवाल यह है कि आखिर जनपद का हर दूसरा व्यक्ति डॉ. तारिक या उनके संस्थान का ‘दुश्मन’ क्यों बन बैठा है? क्या यह महज इत्तेफाक है, या धुएं के पीछे कोई बड़ी आग सुलग रही है?
दलालों का जाल और सिस्टम की चुप्पी
विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो इस अस्पताल का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन ‘दलालों’ के साठ-गांठ पर टिका है। अस्पताल के भीतर पनप रहा यह दलाली तंत्र न केवल मरीजों की जेब काट रहा है, बल्कि चिकित्सा पेशे की गरिमा को भी तार-तार कर रहा है। सवाल यह भी उठता है कि क्या हर बार सीएमओ कार्यालय से लेकर मीडिया मैनेजमेंट तक का ‘खेल’ खेलकर अस्पताल अपनी साख बचा लेगा?
जांच की दरकार
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि शिकायतों के बावजूद ‘मैनेजमेंट’ के आगे सिस्टम नतमस्तक क्यों हो जाता है? क्या स्वास्थ्य विभाग को एक बड़ी अनहोनी का इंतजार है?
जिला अस्पताल के ठीक सामने स्थित यह ‘लाइफ लाइन’ हॉस्पिटल अपनी कार्यप्रणाली के कारण खुद ही ‘वेंटिलेटर’ पर खड़ा नजर आ रहा है। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों ने इसकी सघन जांच नहीं की, तो जनता का सिस्टम से भरोसा उठना तय है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रशासन इस बार अस्पताल की ‘मैनेजमेंट पावर’ से ऊपर उठकर कोई ठोस कार्रवाई कर पाएगा या यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?












